उत्तर कालीन मुगल साम्राज्य की सामान्य जानकारी

उत्तर कालीन मुगल साम्राज्य के अंतर्गत मार्च 1707 ईसवी में अहमदनगर में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात भारतीय इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई जिसे इतिहासकारों ने उत्तर मुगलकाल नाम दिया। यह काल मुगल साम्राज्य के पतन तथा विघटन का काल था औरंगजेब की मृत्यु के साथ ही भारत के लगभग सभी भागों में देसी तथा विदेशी शक्तियों ने अनेक छोटे-बड़े राज्य बना लिए उत्तर पश्चिम की ओर से विदेशी आक्रमण होने लग गए तथा विदेशी व्यापारिक कंपनियों ने भारत की राजनीति में दखल देना शुरू कर दिया परंतु इतनी कठिनाइयों के बाद भी मुगल साम्राज्य का वर्चस्व इतना था किस मुगल साम्राज्य के पतन की गति बहुत मंद रही।

आधुनिक भारत का इतिहास मुग़ल साम्राज्य

औरंगजेब की मृत्यु के समय मुगल साम्राज्य में कुल 21 प्रांतों थे जिसमें मोअज्जम काबुल कामभक्त बीजापुर का सूबेदार था तथा आजम गुजरात का सूबेदार था यादों में जून 1707 में हुए युद्ध में मोअज्जम की सेना ने आजम को पराजित करके मुगल शासन पर अधिकार करने का मार्ग मजबूत दिया तथा 1707 ईस्वी में मोअज्जम बहादुर शाह प्रथम की उपाधि धारण करके दिल्ली की गद्दी पर बैठ गया।

बहादुर शाह प्रथम का शासन काल (1707-12)

उत्तराधिकार का संघर्ष जीतने के बाद में बहादुर शाह प्रथम 65 वर्ष की आयु में भारत का सम्राट बना बहादुर शाह के तख्त पर बैठते समय उसके समर्थकों को नई उपाधियां दी गई तथा समर्थकों को ऊंचे स्तर के पद दिए गए बहादुर शाह प्रथम ने मुनि सखा को वजीर का पद दिया औरंगजेब के वजीर असद खान को वकील ए मुतलक की उपाधि दी गई तथा डेरे जुल्फीकार को मीर बख्शी बनाया गया मीर बख्शी को शाह आलम प्रथम भी कहते हैं भादरसा प्रथम ने अपनी शांतिप्रिय नीति के कारण शाही दरबार के अधिकांश गुटों का सहयोग प्राप्त किया प्रारंभ में उसने आमिर तथा मारवाड़ (जोधपुर) कि राजपूतों पर पहले से ही कड़ा नियंत्रण रखने का प्रयास किया इस उद्देश्य से उसने आमिर की गद्दी पर से जयसिंह को अपदस्थ करके उसके छोटे भाई विजय सिंह को बैठा दिया मारवाड़ के राजा अजीत सिंह को मुगल सत्ता की अधीनता स्वीकार करने के लिए विवश करने की कोशिश की गई बहादुर शाह प्रथम ने आमेर तथा जोधपुर शहरों में सैनिकों का डेरा बनाने की कोशिश की किंतु बहादुर शाह की इस नीति का विरोध हुआ इसीलिए बहादुर शाह प्रथम ने दोनों राज्यों से समझौता कर लिया।

राजा जयसिंह तथा अजीत सिंह को अपने अपने राज्य में ले गए परंतु ऊंचे मनसबों तथा मालवा और गुजरात जैसे महत्वपूर्ण सूबों के सूबेदार के पदों की मांग को बर्खास्त कर दिया।

बहादुर शाह प्रथम की मराठा सरदारों के प्रति नीति-

बहादुर शाह प्रथम की नीति मराठा सरदारों के प्रति अस्थाई रही बहादुर शाह ने मराठों को दक्कन की सरदेशमुखी देदी पर चौथ वसूलने का अधिकार नहीं दिया उसने शिवाजी के पुत्र छत्रपति शाहू जी को मुगलों की कैद में से मुक्त कर दिया और साहू जी को महाराष्ट्र वापस जाने की अनुमति दी बहादुर शाह ने गुरु गोविंद सिंह के साथ संधि की तथा एक बड़ा मन सब देकर के सिखों के साथ एक दूसरे के सहयोग की नीति अपनाई किंतु गोविंद सिंह की मृत्यु के बाद बंदा बहादुर ने पंजाब में मुसलमानों के विरुद्ध एक बड़ा अभियान शुरू किया और लोहागढ़ का किला जिस पर बहादुर शाह प्रथम ने अधिकार कर रखा था उसे गोविंद सिंह अंबाला के उत्तर पूर्व में हिमालय की तराई में बनाया था उसे वापस ले लिया बहादुर शाह ने बुंदेला सरदार छत्रसाल से संधि कर ली छत्रसाल एक ईमानदार और निष्ठावान सामंत बना रहा बादशाह प्रथम दे जाट सरदार चूड़ामण के साथ भी संधि कर ली जाट सरदार ने बंदा बहादुर के खिलाफ अभियान में बहादुर शाह प्रथम का सहयोग किया बहादुर शाह के शासनकाल के दौरान प्रशासनिक की स्थिति बिगड़ी बादशा द्वारा आंख बंद करके जागीर देने तथा पदोन्नति करने के परिणाम स्वरूप शाही खजाने में विशेष खजाना बचा था वह लगभग समाप्त सा हो गया था इसी दौरान बहादुर शाह की 1712 ईसवी में मृत्यु हो गई पादशाह के चार पुत्र थे किन में जहांदार शाह, अजीम-उस-शान, जहानशाह और रफी-उस-शान के मध्य उत्तराधिकार को लेकर के युद्ध हुआ जिसमें जहांदार शाह विजयी रहा। जहां द्वार साहब को शक्तिशाली सामंत जुल्फीकार खान का समर्थन मिला।

जहांदार शाह का शासन काल (1712-13)

बहादुर शाह की मृत्यु के बाद जहां दार शाह एक अयोग्य शासक सिद्ध हुआ उसने शिष्टाचार की कमी थी तथा सदव्यवहार नहीं था। जहांदार शाह निसिंग आसन प्राप्त करने में तत्कालीन शक्तिशाली सामंत जुल्फीकार खान की मदद ली जिसे कालांतर में वजीर के उच्चतम पद पर बैठाया जुल्फीकार खान के पिता असद खान को अपने शासन का वकील नियुक्त किया जुल्फिकार खाने भारतीय असंतुष्ट वर्गों को संतुष्ट करने के प्रयास किए उसने यह सिंह को मालवा का सूबेदार बनाया तथा उसे राजा मिर्जा की उपाधि दी।

अजीत सिंह को महाराजा की पदवी दी अजीत सिंह मारवाड़ के शासक थे अजीत सिंह को गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया गया मराठा शासक को दक्कन का चौथ और वहां के सरदेशमुखी कर वसूल करने की अनुमति इस शर्त पर दी गई कि वसूली मुगल अधिकारी करेंगे और मराठा अधिकारियों को सौंप देंगे जागीरों और ओहदो की की वृद्धि पर अंकुश लगाकर जुल्फीकार खान ने साम्राज्य की वित्तीय हालत को पटरी पर लाने का प्रयास किया लेकिन उसने एक गलत प्रवृत्ति इजारा को बढ़ावा दिया जिससे किसानों का उत्पीड़न पड़ गया यहां दार ने अपने कोकलताश जो जहांदार शाह का धायभाई था उसे महत्वपूर्ण पद दे दिए गोकलदास में एक ऐसा संगठन खड़ा किया जिसका कार्य शासक की शक्तियों को उसी के हाथों में रखने का था। जुल्फीकार खाने अपने सारे प्रशासनिक उत्तरदायित्व अपने करीबी व्यक्ति शुभग चंद्र के हाथों में सौंप दिए। इस कारण प्रजा त्रस्त हो गई।

अजीमुश्शान के पुत्र फर्रूखसियर हिंदुस्तानी अमीर सयद बंधुओं की सहायता से ज्यादा रखो सिंहासन से हटा दिया और 11 फरवरी 1713 को जहांदार शाह की हत्या करवा दी।

फर्रूखसियर का शासन काल (1713-19)

फर्रूखसियर को मुगल सिंहासन पर सैयद बंधुओं ने( अब्दुल्लाह खान और उसेन अली खान बाराहा) ने घटाया अब्दुल्ला खान को बघेल का पद दिया गया तथा कुतुब उल मुल्क की उपाधि से घोषित किया गया और हुसैन अली खान को अमीर-उल-उमरा तथा मीर बख्शी का पद दिया गया।

फर्रूखसियर के कार्यकाल में सिख नेता बंदा बहादुर को गुरदासपुर में गिरफ्तार किया गया और 19 जून 1716 ईस्वी को उसकी हत्या कर दी गई 1717 इसी में ईस्ट इंडिया कंपनी को फर्रूखसियर में व्यापारिक अधिकार दिए और सैयद बंधुओं ने मराठा शासक साहू को स्वराज्य तथा दक्कन के क्षेत्रों की चौथ सरदेशमुखी वसूल करने का अधिकार दे दिया और मराठों से संधि कर ली।

मराठा शासक साहू ने इसके बदले ने मुगलों के लिए 15000 घुड़सवारों के द्वारा फर्रूखसियर का सहयोग देना स्वीकार किया सैयद हुसैन अली ने सन 1719 ईस्वी में पेशवा बालाजी विश्वनाथ से दिल्ली की संधि करके मराठा से सैन्य सहायता ली और फर्रूखसियर को अपदस्थ करके फर्रूखसियर की आंखें फोड़ दी तथा 10 दिन बाद फर्रूखसियर को निर्दयता के साथ मार दिया गया।

रफी-उद-दरजात का शासन काल (1719)

28 फरवरी से 4 जून 1719 तक शासन करने वाला मुगल शासक रफी-उद्-दरजात था। इसे सैयद बंधुओं ने गद्दी पर बैठाया रफी-उद-दरजात की मृत्यु क्षय रोग से हो गई रफी-उद-दरजात के शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण घटना नीकूशियर का विद्रोह था नीकूशियर अकबर द्वितीय का पुत्र था

रफी उद दौला का शासन काल (1719 ईस्वी)

रफ़ी और दो ना मुगल शासन का दूसरा सबसे कम समय तक शासन करने वाला शासक था जिसका कार्यकाल 6 जून से 17 सितंबर 1719 तक रहा रफी उद दौला ने अपने जीवन काल में एक बार महल से बाहर निकलने दिया गया जब उसने आगरा के लिए प्रस्थान किया था तो रफी उद दौला ने शहजाद वित्तीय की उपाधि ग्रहण की तथा रफी उद दौला एक नशेबाज शासक था रफी उद दौला को अफीम का नशा करने की आदत थी रफी उद दौला की मृत्यु भयंकर पेचिश की बीमारी से हो गई।

मोहम्मद शाह का शासन काल  (1719-48 ईस्वी)

सैयद बंधुओं के सहयोग से रोनक अख्तर सितंबर 1719 को मोहम्मद शाह की उपाधि धारण करके राज सिंहासन पर बैठा अत्यधिक बिलासपुर जीवन व्यतीत करने के कारण qqऔर राज्य कार्य के प्रति लापरवाह तथा महिलाओं का शौकीन होने के कारण से रंगीला बादशाह खा गया मोहम्मद शाह के काल में सैयद बंधुओं का अंत हुआ तूरानी दल के मुखिया चिनकिलिच खाॅ निजामुल्मुल्क को सैयद बंधुओं का विनाश करने की खुशी में उसे प्रधानमंत्री बना दिया ।

1724 ईसवी में निजामुल्मुल्क मोहम्मद शाह के शंकालु स्वभाव तथा दरबार में हो रहे निरंतर षड्यंत्र से परेशान होकर वजीर(प्रधानमंत्री) का पद छोड़कर दक्कन चला गया।

चिनकिलिच खाॅ निजामुल्मुल्क 1724 ईसवी में दक्कन में स्वतंत्र हैदराबाद की राज्य की नीव रखी मोहम्मद शामी भी हैदराबाद राज्य को मान्यता प्रदान कर दी और उसे आसफजाह की उपाधि दी। मोहम्मद साहब के कार्यकाल में हैदराबाद के निजाम शाही वंश के साथ ही सहादत खाने अवध में अपने राज्य को स्वतंत्र घोषित किया इसी प्रकार बंगाल बिहार तथा उड़ीसा भी मोहम्मद शाह से आजाद हो गए 01 मार्च 1737 ईस्वी में मराठों ने लगभग 500 घुड़सवार सैनिकों के साथ दिल्ली पर हमला किया परंतु किसी ने मराठों का विरोध नहीं किया 17 जनवरी 1738 ईस्वी में सम्राट तथा मराठों के बीच एक संधि हुई जिसे सिरोंज की संधि कहा जाता है सिरोंज की संधि के परिणाम स्वरूप मुगल सम्राट ने मराठों का अधिकार नर्मदा नदी से लेकर चंबल तक मालिया तथा बदले में मराठा ने सम्राट को पचास लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी।

नादिरशाह का भारत पर आक्रमण (1739 ईस्वी)

 मोहम्मद शाह के शासनकाल में फारस के नादिरशाह ने 1738 39 ईसवी के मध्य भारत पर हमला किया नादिरशाह के आक्रमण  को रोकने के लिए बादशाह ने निजाम उल मुल्क कमरुद्दीन खान तथा खाने दौरा के नेतृत्व में विशाल सेना भीगी तथा शहादत कहां भी उस नेतृत्व में शामिल हो गया 13 फरवरी 1739 को करनाल युद्ध में मुगल सेना की पराजय हुई परंतु निजाम उल मुल्क ने पचास लाख रुपए का हरियाणा देकर नादिरशाह को भारत से बाहर जाने का आग्रह किया नादिरशाह ने यह बात स्वीकार कर ली नादिरशाह दिल्ली में लगभग 57 दिन तक डेरा जमाए रखा और लूटपाट मचाता रहा 1739 ईसवी में भारत से वापस जाते समय नादिर शाह मुगल सिंहासन तख्त ए ताऊस तथा कोहिनूर हीरा और मोहम्मद साहब द्वारा निर्माण करवाई गई हिंदू संगीत की प्रसिद्ध चित्रित फारसी पांडुलिपियों को भी फारस ले गया 1747 में नादिर शाह की मृत्यु हो गई।

  • मोहम्मद शाह के शासनकाल में नादिरशाह का का उत्तराधिकारी अहमद शाह अब्दाली ने 1748 इसलिए भारत पर हमला किया
  • अहमद शाह अब्दाली को दुर्रे दुर्रानी अर्थात युग का मोती संबोधित किया गया है।
  • नादिर शाह ने अहमद शाह अब्दाली के बारे में कहा है कि “अब्दाली कैसे चरित्र का व्यक्ति सारी ईरान,तूरान और हिंदुस्तान में नहीं देखा है।”
  • शहादत खान अवध का नवाब था उससे नादिरशाह ने ₹20 करोड़ की मांग की जिसे शहादत खान नहीं दे पाये और विष खाकर अपनी जीवन लीला को समाप्त कर लिया ।
  • 26 अप्रैल 1748 ईस्वी को मोहम्मद शाह की मृत्यु हो गई।

अहमद शाह अब्दाली का शासन काल (1748-54)

अहमद शाह अब्दाली 28 अप्रैल 1748 ईस्वी को दिल्ली की गद्दी पर बैठा अहमद शाह का जन्म एक नाचने वाली नर्तकी से हुआ था जिसके साथ मोहम्मद शाह ने शादी कर ली थी इस के शासन में राजकीय कामकाज का नेतृत्व ऊधमबाई (किबला-ए-आलम) करती थी उदम भाई ने हिजड़ो के सरदार जावेद खान को नवाब बहादुर की उपाधि दी और सफदरजंग को अपना वजीर नियुक्त किया तथा कमरुद्दीन के पुत्र को मोइन उल मुल्क को पंजाब का सूबेदार बनाया सफदरजंग ने जावेद खान की धोखे से हत्या करवा दी तो अहमद शाह ने इमाद उल मुल्क को अपना वजीर नियुक्त किया और इसी गाजी उद्दीन इमाद उल मुल्क अहमद शाह अब्दाली को उसकी गद्दी से अपदस्थ करके उसकी आंखों को निकलवा दिया तथा अहमद शाह को सलीमगढ़ के कारागार में बंद कर दिया इसके काल में अहमद शाह अब्दाली ने भारत पर कुल 5 बार आक्रमण किए।

आलमगीर द्वितीय का शासन काल (1754-59)

आलमगीर द्वितीय इमाद उल मुल्क का कठपुतली शासक था आलमगीर द्वितीय 55 वर्ष का शासक था आलमगीर ने गाजी उद्दीन इमाद उल मुल्क के विरुद्ध षड्यंत्र रचना आरंभ किया शीघ्र ही उसके संयंत्रों से पर्दा हट गया तोगा जी उद्दीन ने आलमगीर को उसकी गद्दी से अपदस्थ करके आलमगीर द्वितीय की हत्या करवा दी इसके बाद में अली गौहर जो शाह आलम द्वितीय की उपाधि धारण करके मुगल बादशाह की गद्दी पर बैठा।

शाह आलम द्वितीय का शासन काल  (1759-1806)

अलीगौहर जो शाह आलम द्वितीय के नाम से गद्दी पर बैठा था शाह आलम द्वितीय और उसके उत्तराधिकारी केवल नाम मात्र के शासक थे और उसने अपने अमीरों अंग्रेजों तथा मराठों के हाथों की यह केवल कठपुतलियां थे सालम दुतीय के शासनकाल में पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 ईस्वी में हुआ तथा बक्सर का युद्ध 1764 ईस्वी में हुआ बक्सर के युद्ध में शाह आलम द्वितीय ने बंगाल के पदच्युत नवाब मीर कासिम को सहयोग दिया। बक्सर के युद्ध में मीर कासिम की ओर से अवध के नवाब शुजाउद्दौलाने भी भाग लिया। शाह आलम द्वितीय बक्सर के युद्ध में बुरी तरह से हार गया और उसे 1765 ईस्वी में ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ इलाहाबाद की संधि करनी इस संधि के बाद उसे कई वर्षों तक इलाहाबाद में अंग्रेजों की पेंशन पर रहना पड़ा 1772 ईस्वी में मराठों के संरक्षण में वह दिल्ली पहुंचा और 1803 ईसवी तक मराठों ने उसका संरक्षण किया गुलाम कादरी 1788 ईस्वी में शाह आलम द्वितीय की आंखें फोड़ दी और 1806 ईसवी में शाह आलम द्वितीय की हत्या कर दी।

अकबर द्वितीय का शासन काल (1806-37)

शाहआलम की मृत्यु के बाद में उसका पुत्र अकबर द्वितीय मुगल शासक बना अकबर द्वितीय का वास्तविक नाम अहमद शाह अकबर द्वितीय था अकबर द्वितीय अंग्रेजों के संरक्षण में बनने वाले प्रथम मुगल बादशाह था। अहमद शाह अकबर द्वितीय ने राजा राम मोहन राय को राजा की उपाधि दी तथा 1835 ईस्वी में मुगलों के सिक्के बंद हो गए और 18 से 30 ईसवी में अकबर द्वितीय की मृत्यु हो गई।

बहादुर शाह द्वितीय का शासन काल भारत का अंतिम बादशाह (1837-62)

अकबर द्वितीय की मृत्यु के बाद उसका पुत्र बहादुर शाह द्वितीय 1837 ईस्वी में भारत का शासक बना बहादुर शाह द्वितीय भारत का अंतिम मुगल सम्राट था बहादुर शाह द्वितीय को ‘जफर के नाम से  कविता  तथा शायरी लिखने के कारण बहादुर शाह जफर के नाम से भी जाना जाता है। 1857 की क्रांति में क्रांतिकारियों का साथ देने की वजह से अंग्रेजों ने इन्हें गिरफ्तार करके रंगून की जेल में भेज दिया जहां 1862 ईसवी में उनकी मृत्यु हो गई और इसी के साथ मुगल साम्राज्य का पतन हो गया।

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