प्रागैतिहासिक काल की विस्तृत जानकारी

धरती की परत का विकास 4 अवस्थाओं में हुआ है. जिसमे अंतिम अर्थात चौथी अवस्था क्वाटर्नरी कहते हैं. इसे दो चरणों में विभक्त किया गया है – अद्यतन(होलोसीन) और अतिनवीन(प्लायिस्तोसिन).

मनुष्य का पृथ्वी पर अतिनवीन(प्लायिस्तोसिन) अवस्था के अंतर्गत उत्पन्न हुआ और संसार के अन्य जीव जैसे- हाथी, बकरी, घोडा, मोर, हिरण, गाय, भेंस, ऊँट, गधा आदि. पृथ्वी पर प्रथम मानव के जो साक्ष्य मिले हें उसे ‘रामापीथेकस’ की संज्ञा दी है. सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में मानव के कोई जीवाश्म नहीं मिले हैं. लकिन आदि मानव द्वारा प्रयुक्त औजारों (कार्बनडेटिंग) के आधार पर मानव की उत्पत्ति का काल लगभग 5 लाख ई.पू. से 2.5  लाख ई.पू माना गया हैं. भारत की नर्मदा नदी घाटी में सर्वप्रथम मानव के अवशेष प्राप्त हुए हैं.

प्रारंभिक मानव की गतिविधियों रहन-सहन के आधार पर प्रागैतिहासिक काल(Pre History) को मुख्यतः भागों में बांटा गया हैं.

पुरापाषाण काल किसे कहते हैं.

मनुष्य के प्रारंभिक क्रियाकलाप पुरापाषाण काल में ही प्रकट होने लगे थे पुरापाषाण काल में मनुष्य अपनी जीविका चलने के लिए पशुओ के शिकार, फल भक्षण और खाद्य सामग्री का संचय में व्यस्त रहता था. और मानव आवास के रूप में कंदराओं, गुफाओ, वृक्षों, और खुले असमान के नीचे रहता था. और परिवार या समाज में नहीं रहता था. पुरापाषाण काल में मानव सम्बंधित प्रमुख ज्ञात स्थलों में लगभग गंगा और सिन्धु नदी के मैदानों को छोड़करसम्पूर्ण भारतीय उप महाद्वीप आता हैं.

जैसे-जैसे समय गुजरा मनुष्य ने कुछ प्रगति की थी जो निम्नलिखित तीन चरणों और उप चरणों हुई. मानव इतिहास का लगभग 90 फीसदी भाग इसी कालखण्ड में घटित हुआ है जिसका हमें नीचे विस्तृत और क्रमबद्ध वर्णन करेंगे.

  • पुरापाषाण काल(Palaeolithic Age)- 5 लाख ई.पू. से 10 हज़ार ई.पू. तक
  • मध्यपाषाण काल(Mesolithic Age)- 10 हज़ार ई.पू. से 7 हज़ार ई.पू. तक
  • नवपाषाण काल(Neolithic Age)- 7 हज़ार ई.पू. के बाद आब तक.

मनुष्य के प्रारंभिक क्रियाकलाप पुरापाषाण काल में ही प्रकट होने लगे थे पुरापाषाण काल में मनुष्य अपनी जीविका चलाने के लिए पशुओ के शिकार, फल भक्षण और खाद्य सामग्री का संचय में व्यस्त रहता था. और मानव आवास के रूप में कंदराओं, गुफाओ, वृक्षों, और खुले असमान के नीचे रहता था. और परिवार या समाज में नहीं रहता था. पुरापाषाण काल में मानव सम्बंधित प्रमुख ज्ञात स्थलों में लगभग गंगा और सिन्धु नदी के मैदानों को छोड़करसम्पूर्ण भारतीय उप महाद्वीप आता हैं.

जैसे-जैसे समय गुजरा मनुष्य ने कुछ प्रगति की थी जो निम्नलिखित तीन चरणों और उप चरणों हुई. मानव इतिहास का लगभग 90 फीसदी भाग इसी कालखण्ड में घटित हुआ है जिसका हमें नीचे विस्तृत और क्रमबद्ध वर्णन करेंगे.

पुरापाषाण काल(Palaeolithic Age) के निम्नलिखित उपभेद किये जा सकते हैं-

पुरापाषाण काल(Palaeolithic Age)- 5 लाख ई.पू. से 10 हज़ार ई.पू. तक- का भी तीन खंडो में विभाजन किया गया है

निम्न पुरापाषाण काल( Lower Palaeolithic Age) 5 लाख ई.पू. से 50 हज़ार ई.पू. तक

मध्य पुरापाषण काल( Middle Palaeolithic Age) 50 हज़ार ई.पू. से 40 ई.पू. तक

उच्च पुरापाषाण काल (Upper Palaeolithic Age) 40 हज़ार ई.पू. से 10 हज़ार ई.पू. तक.

निम्न पुरापाषाण काल( Lower Palaeolithic Age) 5 लाख ई.पू. से 50 हज़ार ई.पू. तक- यह कालखण्ड एक ठण्डी जलवायु का कालखण्ड था था इस काल में क्रोड़ औजारों(उपकरणों) की प्रधानता थी क्रोड़ उपकरणों में हस्त कुठार, छेदक(काटने वाला औजार) खंडक(टुकड़े करने वाला औजार) विदारिणी(फाड़ने वाला औजार) ये सभी उपकरण क्वार्टजाइट किस्म की पत्थर से बने होते थे. इसके साक्ष्य हमें बेलन घाटी, सोहन घाटी, नेवासा घाटी, भीमबैठका की गुफाओं, और आदमगढ़ से उपलब्ध हुए हैं. इस काल में मानव ज्यादा विक्सित नहीं था उसका जीवन पशुतुल्यं था.

मध्य पुरापाषण काल( Middle Palaeolithic Age) 50 हज़ार ई.पू. से 40 ई.पू. तक- इस कालखण्ड में मानव ने पहले की अपेक्षा थोडा ज्यादा विकास किया यद्यपि इस काल में भी मानव स्थिर नहीं था. लेकिन औजार बनाने में ज्यादा विकास किया और पहले से ज्यादा सुन्दर और तीक्ष्ण औजार बनाये और कुछ नए औजारों का भी अविष्कार किया जैसे- पत्थर की पतली-पतली पट्टियों से पैने-पैने फलक, वेधनी(छेद करने का औजार) छेदनी(छैनी) और खुरचनीआदि.

इस काल में भी क्वार्टजाइट पत्थर के साथ-साथ जैस्परऔर चर्ट को कच्चे माल के रूप में प्रयुक्त किया गया. नेवासा में इस काल के भरपूर साक्ष्य प्राप्त हुए हैं इसके अलावा भीमबैठका गुफा, राजस्थान के डीडवाना और नर्मदा नदी घाटी भी प्रमुख स्थल हैं.

उच्च पुरापाषाण काल (Upper Palaeolithic Age) 40 हज़ार ई.पू. से 10 हज़ार ई.पू. तक.- इस काल में भारत की जलवायु शुष्क हो गयी थी और यह युग होमोसेपियंस (आधुनिक मानव) का युग था. इस समय के औजारों में प्रमुख तक्षणी और खुरचनी तथा अस्थियों से बने उपकरण थे. इस युग में लम्बे फलक वाले पत्थरों से ज्यादा औजार और उपकरण बनाये गए थे और मनुष्य ने आवास के लिए शैलाश्रयों का सहारा लिया शैलाश्रयो की भित्तियों पर कलात्मक नक्काशी और चित्रकला बनाना शुरू किया. यहाँ सभ्यता का प्रमुखत: बेलन घाटी, गुजरात, चित्तूर, कुर्नूल, छोटा नागपुर का पठार और मध्य भारत में विकास  हुआ.

मध्यपाषाण काल(Mesolithic Age)- 10 हज़ार ई.पू. से 7 हज़ार ई.पू. तक-

यह काल पुरापाषाण काल और नव पाषाण काल का संक्रमण काल है क्योकि इसमें अग्रलिखित दोनों के अंश मिलते हैं मध्यपाषाण काल(Mesolithic Age) में विभिन्न पर्यावरणीय परिवर्तन देखने को मिलते हैं इस युग में मानव पशुओं का शिकार करके और मछली पकड़कर अपना भोजन प्राप्त करता था इस काल में पत्थर के उपकरण पहले की अपेक्षा छोटे थे इन छोटे उपकरणों की बजह से इस काल को लघुपाषाण युग (माइक्रोलिथ) कहा जाता है. मध्यपाषाण काल(Mesolithic Age) के औजारों में प्राय: लकड़ी या हड्डीयों के हत्थे लगे हुए आरी और हंसिया प्राप्त हुए हैं. इस योग में ब्लेड, त्रिकोण, चंद्राकर फरसे आदि भी प्राप्त हुए हैं.

मध्यपाषाण काल(Mesolithic Age) इस युग की विभिन्न उपलब्धियाँ-

पशुपालन की शुरुआत सर्वप्रथम इसी काल में हुई. जिसके साक्ष्य हमें राजस्थान के बागोर और आदमगढ़ में मिले हैं

मानव ने स्थायी रूप से रहना प्रारंभ किया जिसके साक्ष्य महदहा, सराय नाहर, से मिलते हैं.

तीर-कमान का अविष्कार सर्वप्रथम इसी काल में हुआ.

युद्धों से सर्वप्रथम साक्ष्य भी इसी युग के प्राप्त होते हें – प्राप्ति स्थल सराय नाहर राय.

चित्रकारी के प्रथम साक्ष्य हमें भीमबैठका से मिलते हैं मातृदेवी की उपासना का प्रारंभिक साक्ष्य भी इसी युग का है.

शवों को संरक्षित करने की पद्दति भी इसी युग में सामने आई.

नवपाषाण काल(Neolithic Age)- 7 हज़ार ई.पू. के बाद अब तक- सर जॉन लुबाक ने सबसे पहले नवपाषाण काल के लिए सन 1865 ई. में नियोलिथिक( Neolithic) शब्द का प्रयोग किया था और सन 1860 ई. में मेसुरीचरने सबसे पहले इसे उत्तर प्रदेश की टोंस नदी घाटी से प्राप्त किया तथा यहाँ से पहले प्रस्तर उपकरण भी प्राप्त किये.

नवपाषाण काल(Neolithic Age) की कुछ विशेषताएँ भी थी जो निम्नलिखित हैं-

  • इस काल में सर्वप्रथम कृषि कार्य का आरंभ हुआ.
  • पशुओं को पालना शुरू हुआ.
  • घिसे हुए पालिश वाले पत्थर के उपकरणों का प्रयोग प्रारंभ हुआ.
  • इस काल में मानव ने भोजन का संग्रह करना सिख लिया.
  • इस काल के मानव ने मिटटी और सरकंडे तथा मोटी लकड़ी से आवास बनाना शुरू कर दिया.
  • इस काल के लोगों ने बस्तियाँ बसाकर रहना प्रारंभ कर दिया.
  • इसी काल में मानव ने आयताकार घर बनाकर रहना शुरू कर दिया. मकानों में मिटटी की कच्ची इंटों का प्रगोग किया.
  • इस काल में मनुष्य खाद्य पदार्थों का उत्पादन करना सीख गया.
  • इस इस काल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि ये थी की मानव ग्रामीण जीवन जीने लग गया.

मेहरगढ (बलूचिस्तान) खेती के सबसे प्राचीन साक्ष्य प्राप्त हुए हैं तथा इस काल में गेंहू,, खजूर, कपास, जौ आदि फसलो के साक्ष्य मिले हैं. मेहरगढ़ ऐसा प्रथम गाँव है जिसमे नवपाषाण काल और ताम्रपाषाण काल के अवशेष मिले हैं इसमें दोनों कालों का संक्रमण देखा जा सकता हैं इसका समय लगभग 5000 ई. पू. है.

इसी प्रकार कश्मीर के गुफ्कारालऔर बुर्जहोम से मृदभांड(मिटटी के बर्तन) गर्तावास(गड्ढे में बने घर) प्रस्तर और हड्डियों के विभिन्न औजार भी मिले हें.

  • मालिकों के साथ पालतू कुत्तो को दफन करने के साक्ष्य भी बुर्जहोम से मिले हैं.
  • हिरणों के सींगों से बने औजार बिहार के चिरांद नमक स्थान प्राप्त हुए हैं.
  • राख़ के बड़े-बड़े ढेर कर्नाटक के पिक्लीहाल से प्राप्त हुए हैं जो संभवतः मिटटी के बर्तन पकाने की तरफ संकेत करते हैं.

ताम्रपाषाण काल-

यह युग नवपाषाण के समाप्त होने पर शुरू हुआ. इस काल में मानव ने तांबा नामक धातु को खोजा जो उस काल की सबसे क्रांतिकारी खोज थी अब मानव ने पत्थर के औजारों के साथ-साथ तांबे के औजारों का प्रयोग करना शुरू कर दिया था. इस युग को ताम्रपाषाण युग कहा जाता है. इस काल में मनुष्य ने समूह बनाकर रहना शुरू कर दिया था और मनुष्य की भ्रमणशील प्रवृति पर अंकुश लगा. इस ताम्रपाषाण युग के साक्ष्य भारत के विशाल भू-भाग से प्राप्त होते हैं जैसे-दक्षिण-पूर्वी राजस्थान के क्षेत्र, पश्चिमी मध्यप्रदेश के क्षेत्र महाराष्ट्र और दक्षिण-पश्चिम भारत के भाग.

महाराष्ट्र के नवदाटोली नामक स्थान से दाल, गेंहू और धान की खेती के प्रमाण मिले हैं. इसी काल की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि मनुष्य ने अपने कौशल के अनुसार काम करना शुरू किये इस काल में कुम्भकार, जुलाहे, हाथी दांत के शिल्पकार, धातुकार, टेराकोटा(मिट्टी) के खिलोने निर्माता आदि के प्रमाण मिले हैं. इस स्थल का उत्खनन एच. डी. सांकलिया ने करवाया.

इस युग में समाज मातृसत्तात्मक था और बैल (बृषभ) को धर्म का प्रतीक माना जाता था. मिट्टी के रंगीन चित्रित बर्तनों का उपयोग भी इसी युग में किया जाने लगा. हल्लूर नामक स्थान से घोड़े की एक अस्थि प्राप्त हुई हैं जो इस बात का प्रमाण है की ताम्रपाषाण काल के लोग घोड़े से परिचित थे.

किलेदार और चारों ओर से गहरी खाई से घिरी हुई बस्तियाँ जोरवे के दैमाबाद की इनामगाँव है. इनामगाँव में पांच कमरों वाले घर के अवशेष प्राप्त हुए हैं.

शुतुरमुर्ग के अवशेष महाराष्ट्र के पटने से सन 1863 ई. में रॉबर्ट ब्रूस फुट ने खोजे.

आहाड़ का प्राचीन नाम ताम्रवती है इस संस्कृति स्थानीय केंद्र गिलुन्द है आहड़ संस्कृति के लोग पत्थरो के घरों में निवास करते थे.बनास नदी घाटी से तांबे से निर्मित सीधे सपाट कुठार( कुल्हाड़ी) और चूड़ियाँ प्राप्त हुयी हैं. कीमती पत्थरों के मनको(गोलियों) से बने हार जमे हुए मिले हैं.

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