भारत की भूगर्भिक  संरचना भारत का भूगोल

भारत का भूगोल भारत की भूगर्भिक संरचना भूमि के गर्भ में चट्टानों की प्रकृति उनके क्रम तथा व्यवस्था को भूगर्भ शास्त्र में भूगर्भिक संरचना कहते हैं भूगर्भिक संरचना पर किसी प्रदेश का  उच्चावच या धरातल तथा  वहां की मृदा रासायनिक संरचना निर्भर करती है स्थल रूपों के विकास को नियंत्रित करने वाला मुख्य कारक भूगर्भिक संरचना है भूगर्भिक संरचना के अध्ययन से हमें अनेकों बहुमूल्य खनिज का ज्ञान होता है

भूगर्भिक संरचना का इतिहास

भारत के भूगर्भिक इतिहास से हमें ज्ञात होता है कि यहां पर नवीन चट्टानों से लेकर अत्य प्राची चट्टानें तक पाई जाती है भारतीय उपमहाद्वीप में प्रीकैंब्रियन योग और आर्कियन युग की चट्टाने मौजूद है और यह कितने प्राचीन है जितना कि स्वयं भारत दूसरी तरफ  क्वार्टरनरी युग की नवीन चट्टाने कांप मिट्टी के परतदार निक्षेपो में पाई जाती है। भारत का भूगोल

भूगर्भिक संरचना के आधार पर भारत को तीन मुख्य भागों में बाँटा जाता है-

1- नवीन मोडदार पर्वत श्रेणियां। हिमालय पर्वत श्रंखला

2- सिंधु,गंगा एवं ब्रह्मपुत्र नदी मैदान

3- प्रायद्वीप का पठार दक्षिण भारत.

नवीन मोडदार पर्वत श्रेणियां अथवा हिमालय- हिमालय का निर्माण कोई आकस्मिक प्रक्रिया का परिणाम नहीं है बल्कि हिमालय का निर्माण एक लंबे भूगर्भिक ऐतिहासिक काल से होकर संपन्न हुआ है हिमालय के निर्माण के संबंध में भूगर्भ शास्त्री गोवर का भूसन्नति का सिद्धांत और हैरी हैस का प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत सर्वाधिक मान्य रहा है. वर्तमान में प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत हिमालय की उत्पत्ति की सबसे अच्छी व्याख्या करता है इसके अनुसार लगभग पृथ्वी पर 7 करोड़ों वर्ष पूर्व उत्तर में स्थित यूरेशियन प्लेट की ओर भारतीय उपमहाद्वीप प्लेट उत्तर पूर्वी दिशा में गतिशील हुई और दो से तीन करोड़ वर्ष पूर्व यह दोनों प्लेट अत्यधिक निकट आ गई जिसकी वजह से टेथिस सागर के स्थान पर भूमि पर उभर आई और भूमि के अवसादो में वलन (मोड) पड़ने लगा। और टेथिस सागर के स्थान पर वर्तमान हिमालय का उत्थान प्रारंभ हो गया लगभग एक करोड़ वर्ष पूर्व हिमालय की सभी श्रृंखलाएं अपना पूर्ण आकार ले चुकी थी। चट्टानों के रूप में नीस सिस्ट क्वार्टजाइट आदि हिमालय के प्राचीन क्रिस्टलीय लिए आधार से प्राप्त होते हैं जबकि निर्णय वाले के साथ साथ मिलने वाली मिट्टी युक्त शैले विंध्य समूह सामुद्रिक वाली चट्टानों के समान है।

 सिंधु,गंगा एवं ब्रह्मपुत्र नदी के मैदान की जानकारी

सिंधु,गंगा एवं ब्रह्मपुत्र का मैदान हिमालय के बाद बना है तथा यह नवीनतम भूखंड है इसका निर्माण क्वार्टनरी महाकल्प के प्लस्टोसीन और होलोसीन कल अपने हुआ है टेथिस सागर की भू संरचना के निरंतर सकरा एवं छिछला होने तथा हिमालय एवं दक्षिणी नदियों द्वारा लाए गए निक्षेपो या अवसादो के जमाव से इस मैदान का निर्माण हुआ है यह मैदान स्तरीय बालूका चीका मिट्टी के निक्षेपण तथा जैविक घटकों से बना है यह जलोढ़ अवसादो की गहराई अलग अलग है और पश्चिम की ओर इसकी मोटाई बढ़ती जाती है राजमहल की पहाड़ियों एवं शिलांग के पठार के मध्य जलोढ़ मिट्टी के जमाव के नीचे प्राचीन  शैलों का उथला हुआ क्रम  प्राप्त होता है मैदानों के उत्तरी भाग में जलोढ़ मिट्टी के नीचे असंगठित शिवालिक श्रेणी के अवसाद पाए जाते हैं तथा पुराने विभागों के नीचे गोंडवाना जैसे पुराने भूमि के स्वरूप हैं

सिंधु गंगा ब्रह्मपुत्र के मैदान की विशिष्ट भूगर्भ की स्थिति में कुछ विशेष भौगोलिक लक्षणों को जन्म दिया है बांगर पुरानी जलोढ़ वेदिकाए है जिओ गहरे रंग की है तथा चुना कार्बोनेट से बनी हुई है यही चुना कार्बोनेट कंकड़ ओं के रूप में दिखाई देता है इन पुरानी वेदिका की उत्पत्ति मध्य ऊपर प्लस्टोसीन युग से हुई है चंबल एवं मध्य यमुना घाटी के खड्डे बांगर उच्च भूमि के श्रेष्ठ उदाहरण हैं

खादर मिट्टी हल्के रंग की नवीन जलोढ़ मिट्टी है जिसमें क्यों ना पदार्थों की कमी पाई जाती है तथा यह ऊपरी प्लस्टोसीन यू से संबंधित है समान रूप वाले भूड निक्षेप मुरादाबाद एवं उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिलों में विस्तृत हैं तथा खोल एक प्रकार का मध्यवर्ती ढाल है जो पुरानी उच्च भूमि और नई निम्न खादर मैदानों के बीच विस्तृत है

प्रायद्वीपीय पठार का अध्ययन

भारत का प्रायद्वीपीय पठार भू पृष्ठ एक भूखंडों को प्रदर्शित करता है जो प्रीकैंब्रियन युग से पर्वत निर्माण कार्य तथा हलचल सदैव प्रभावित रहा है यह भू पृष्ठ की उन प्राचीनतम सलाओ से बना है जो अत्यंत ही कठोर क्षेत्र हैं जिन का सर्वाधिक संदलन एवं कार्य अंतरण हुआ है रविवार सेनाओं के इस निम्नतम पर बाद के अवसाद एवं लावा प्रवाह (दक्कन ट्रैप) है भौगोलिक संरचना

प्राचीन समय से ही इस क्षेत्र पर अपरदन के विभिन्न कारक सक्रिय रहे हैं जो पठार का विस्तृत क्षेत्र संप्रदाय मैदान की अवस्था में पहुंच रहा है

प्लेट विवर्तनिकी सिद्धांत के अनुसार भारत के उत्तर की तरफ प्रवाह की शुरुआत लगभग 121 मिलियन वर्ष पहले हुई थी तथा लगभग 50 मिलीयन वर्ष पहले भारत और ऑस्ट्रेलिया एक ही प्लेट के हिस्सा थे सबसे अंत में क्रीटेशस काल में मेडागास्कर भारत से अलग हुआ उसी समय पश्चिमी एवं पूर्वी तटों के सहारे अवसंवलन जिसमें अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की उत्पत्ति हुई और मध्यवर्ती भाग एक ऊंचे पठार की तरह रहा जिसको प्रायद्वीप कहा जाता है प्रायद्वीपीय भारत की संरचना में निम्नलिखित चट्टाने क्रम से मिलती हैं

 भारतीय प्रायद्वीप पठार के बारे में विशेष तथ्य-

अल्फ्रेड वेगनर किस सिद्धांत के अनुसार लगभग 200 मिलियन वर्ष पहले विश्व के सभी महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े हुए थे इस पूरे संयुक्त द्वीप को पैंजिया के नाम से जाना जाता था और यह पैंथालसा नामक महासागर से घिरा हुआ था

अल्फ्रेड वेगनर के अनुसार ही लगभग 135 मिलियन वर्ष पूर्व पंजिया महाद्वीप दो बड़े भूखंडों में बट गया इसके उत्तरी भूखंड को अंगारा लैंड कहा गया तथा दक्षिणी भूखंड को गोंडवाना लैंड कहां गया यह दोनों भूखंड एक संकीर्ण महासागर अलग होते थे किसे टेथिस सागर कहा जाता था बाद में अंगारा लैंड एवं गोंडवाना लैंड महाद्वीपों का वर्तमान वितरण मानचित्र पर उभर कर आया.

भारतीय उपमहाद्वीप में निम्नलिखित क्रम की चट्टाने पाई जाती हैं जिनका विवरण निम्नलिखित प्रकार से है

आर्कियन क्रम की चट्टाने- आर्कियन क्रम की चट्टाने अत्यंत प्राचीन चट्टान होती हैं जिन्हें का उद्भव आज से लगभग 125 करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी के ठंडा होने पर सबसे पहले हुआ पृथ्वी की भूगर्भिक हलचलों के कारण के कारण एक चट्टानों का बहुत ही ज्यादा रुपांतरण हो चुका है और यह अपना वास्तविक रूप हो चुकी हैं इन चट्टानों में  नाइस  सिस्ट  और ग्रेनाइट अति महत्वपूर्ण है यह सभी स्फटिक तथा रवेदार चट्टाने है और इन चट्टानों में जीवो के अवशेषों का क्राय अभाव रहता है इनमें कहीं-कहीं पर आग्नेय मैग्मा तथा कायांतरित अवसादी चट्टानें भी मिलती है भारतीय महाद्वीप में ऐसी चट्टानों का विस्तार मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ आंध्र प्रदेश कर्नाटक तमिलनाडु छोटा नागपुर का पठार तथा उड़ीसा आज स्थानों पर आर्कियन युग की चट्टाने पाई जाती है.

कुडप्पा क्रम की चट्टानों का अध्ययन

कडप्पा क्रम की चट्टानों का निर्माण धारवाड़ क्रम की चट्टानों के अपरदन तथा निक्षेपण से हुआ है यह चट्टाने अपेक्षाकृत कम रूपांतरित होती हैं कडप्पा क्रांति चट्टानों में भी जीवो के अवशेष का अभाव पाया जाता है और इन चट्टानों का नामकरण आंध्र प्रदेश के कडप्पा नामक जिले के आधार पर हुआ है वहां यह अर्धचंद्राकार पेटी में विस्तृत है यह चट्टान आंध्र प्रदेश के अतिरिक्त राजस्थान हिमालय के कुछ क्षेत्र छत्तीसगढ़ के अतिरिक्त हिमालय के कुछ क्षेत्रों में कृष्णा घाटी और नल्ला मलाई पर्वत श्रेणी चेयार और पापाचशि पर्वत श्रेणी में पाई जाती हैं

कोलकाता क्रम की चट्टानों में सामान्यत है क्वार्टजाइट  पत्थरों की प्रधानता पाई जाती है  कडप्पा क्रम की चट्टानों से लोहा मैगनीज कडप्पा तथा कुरनूल जिले से एस्बेस्टस ताल का संगमरमर तथा अन्य रंगीन पत्थर निकाले जाते हैं

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